नविप्रपादोदकपंकीलानि
न वेदशास्त्रध्वनि गजिॅतानि।
स्वाहास्वधाकार विवजिॅतानि श्मशान तुल्यानि गृहानि तानि।।
जिस के घर मे ब्राह्मण के चरण की रज गिरी न हो ।वेद और शास्त्र का गान न हुआ हो। स्वाहा और स्वधा का गान घर में न हुआ हो। वो घर श्मशान तुल्य समझना चाहिए।
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