Wednesday, January 7, 2015

आ शु छे बधु
मोदी भी मन्नू के रस्ते....

भारत मे प्रथम स्वदेशी आंदोलन की कहानी जरूर पढ़ें !!
आपको अंदाजा हो जाएगा कि स्वदेशी आंदोलन की ताकत
कितनी बड़ी होती है !!
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1894 मे अंग्रेज़ो ने भारत मे एक बहुत खतरनाक कानून
बना दिया !उस कानून मे ये था कि किसी भी स्थान 5
भारतीय से अधिक भारतीय इकट्ठे नहीं हो सकते ! समूह
बनाकर कहीं प्रदर्शन नहीं कर सकते ! और अगर कोई ब्रिटिश
पुलिस का अधिकारी उनको कहीं इकट्ठा देख ले तो आप
विश्वास नहीं कर सकते
कितनी कड़ी सजा उनको दी जाती थी ! उनको कोड़े से
मारा जाता था ! और हाथो से नाखूनो तक को खींच
लिया जाता था ! 1882 मे भारत के
क्रांतिकारी जिनका नाम था बंकिम चंद्र चटर्जी उन्होने
एक गीत लिखा था जिसका नाम था वन्देमातरम ! तो इस
गीत को गाने पर अंग्रेज़ो ने प्रतिबंद लगा दिया ! और गीत
गाने वालों को जेल मे डालने का फरमान जारी कर दिया !
तो इन दोनों बातों के कारण लोगो मे अंग्रेज़ो के प्रति बहुत
भय आ गया था !!
लोगो मे अंग्रेज़ो के प्रति भय को खत्म करने के लिए और इस
कानून का विरोध करने के लिए लोकमान्य तिलक ने
गणपति उत्सव की स्थापना की ! और सबसे पहले पुणे के
शनिवारवाडा मे गणपति उत्सव का आयोजन किया गया !
1894 से पहले लोग अपने अपने घरो मे गणपति उत्सव मनाते थे
लेकिन 1894 के बाद इसे सामूहिक तौर पर मनाने लगे ! तो पुणे
के शनिवारवडा मे हजारो लोगो की भीड़ उमड़ी !
लोकमान्य तिलक ने अंग्रेज़ो को चेतावनी दी कि हम
गणपति उत्सव मनाएगे अंग्रेज़ पुलिस उन्हे गिरफ्तार करके
दिखाये ! कानून के हिसाब से अंग्रेज़ पुलिस
किसी राजनीतिक कार्यक्रम मे उमड़ी भीड़
को ही गिरफ्तार कर सकती थी लेकिन किसी धार्मिक
समारोह मे उमड़ी भीड़ को नहीं !!
इस प्रकार पूरे 10 दिन तक 20 अक्तूबर 1894 से लेकर 30 अक्तूबर
1894 तक पुणे के शनिवारवाड़ा मे गणपति उत्सव
मनाया गया ! हर दिन लोक मान्य तिलक वहाँ भाषण के
लिए किसी बड़े व्यक्ति को आमंत्रित करते ! 20 तारीक
को बंगाल के सबसे बड़े नेता बिपिन चंद्र पाल वहाँ आए !! और
ऐसे ही 21 तारीक को उत्तर भारत के लाला लाजपत राय
वहाँ पहुंचे ! इसी प्रकार एक ही परिवार मे पैदा हुए तीन
क्रांतिकारी भाई जिनको चापेकर बंधु कहा जाता है
वहाँ पहुंचे ! वहाँ 10 दिन तक इन महान नेताओ के भाषण हुआ
करते थे ! और सभी भाषणो का मुख्य
मुद्दा यही होता था कि गणपति जी हमको इतनी शक्ति दें
कि हम भारत से अंग्रेज़ो को भगाएँ ! गणपति जी हमे
इतनी शक्ति दें के हम भारत मे स्वराज्य लाएँ ! इसी तरह अगले
साल 1895 मे पुणे के शनिवारवाड़ा मे 11 गणपति स्थापित
किए गए और उसके अगले साल 31 !और अगले साल ये
संख्या 100 को पार कर गई ! फिर धीरे -धीरे पुणे के नजदीक
महाराष्ट्र के अन्य बड़े शहरो मे ये गणपति उत्सव
अहमदनगर ,मुंबई ,नागपुर आदि तक फैलता गया !! हर वर्ष
हजारो लोग इकट्ठे होते और बड़े नेता उनमे राष्ट्रीयता भरने
का कार्य करते ! और इस तरह लोगो का गणपति उत्सव के
प्रति उत्साह बढ़ता गया !!! और राष्ट्र के
प्रति चेतना बढ़ती गई !!
1904 में लोकमान्य तिलक ने लोगो से
कहा कि गणपति उत्सव का मुख्य उद्देशय स्वराज्य हासिल
करना है आजादी हासिल करना है ! और अंग्रेज़ो को भारत से
भगाना है ! बिना आजादी के गणेश उत्सव का कोई महत्व
नहीं !! पहली बार लोगो ने लोकमान्य तिलक के इस उद्देश्य
को बहुत गंभीरता से समझा ! इसके बाद एक दुर्घटना हो गई
अपने देश में !! 1905 मे अंग्रेज़ो की सरकार ने बंगाल
का बंटवारा कर दिया एक अंग्रेज़
अधिकारी था उसका नाम था कर्ज़न ! उसने बंगाल
को दो हिस्सो मे बाँट दिया !एक पूर्वी बंगाल एक
पश्चमी बंगाल ! पूर्वी बंगाल था मुसलमानो के लिए
पश्चमी बगाल था हिन्दुओ के लिए !! हिन्दू और मूसलमान के
आधार पर यह पहला बंटवारा था ! और इसका नाम
रखा division of bengal act !! बंगाल उस समय भारत
का सबसे बड़ा राज्य था और इसकी कुल आबादी 7 करोड़
थी !
लोकमान्य तिलक ने इस बँटवारे के खिलाफ सबसे पहले विरोध
की घोषणा की उन्होने ने लोगो से कहा अगर अंग्रेज़ भारत मे
संप्रदाय के आधार पर बंटवारा करते हैं तो हम
अंग्रेज़ो को भारत में रहने नहीं देंगे !! उन्होने अपने एक मित्र
बंगाल के सबसे बड़े नेता बिपिन चंद्रपाल
को बुलाया अरबिंदो गोश जी को बुलाया और कुछ और
अन्य बड़े नेताओं को बुलाया !! और उन्हे कहा की आप बंगाल
मे गणेश उत्सव का आयोजन कीजिये !! तो बिपिन चंद्र पाल
जी ने कहा कि बंगाल के लोगो पर गणेश जी का प्रभाव
ज्यादा नहीं है ! तो तिलक जी ने पूछा फिर किसका प्रभाव
है ?? तो उन्होने के कहा नवदुर्गा एक उत्सव मनाया जाता है
उसका बहुत प्रभाव है !! तो तिलक जी ने कहा ठीक है मैं
यहाँ गणेश उत्सव का आयोजन करता हूँ आप वहाँ दुर्गा उत्सव
का आयोजन करिए !! तो बंगाल मे समूहिक रूप से दुर्गा उत्सव
मनाना शुरू हुआ जो जब तक जारी है ! तो दुर्गा उत्सव और
गणेश उत्सव के आयोजनो के माध्यम से लाखो-लाखो लोग
तिलक जी के संपर्क मे आए और तिलक जी ने उन्हे
कहा कि आप सब इस बंगाल विभाजन का विरोध करें !!
तो लोगो ने पूछा कि विरोध का तरीका क्या होगा ???
तो लोकमान्य तिलक ने कहा कि देखो भारत मे
अँग्रेजी सरकार ईसट इंडिया कंपन्नी की मदद से चल रही है !
ईस्ट इंडिया कंपनी का माल जब तक भारत मे बिकेगा तब तक
अंग्रेज़ो की सरकार भारत मे चलेगी !! जब माल बिकना बंद
हो गया तो अंग्रेज़ो के पास धन जाना बंद हो जाएगा ! और
अँग्रेज़ भारत से भाग जाएँगे !!
इस तरह से लोगो ने बँटवारे का विरोध किया ! और भंग भंग के
विरोध मे एक आंदोलन शुरू हुआ ! और इस आंदोलन के प्रमुख
नेता थे (लाला लाजपतराय) जो उत्तर भारत मे थे !(विपिन
चंद्र पाल) जो बंगाल और पूर्व भारत का नेतत्व करते थे ! और
लोक मान्य बाल गंगाधर तिलक जो पश्चिम भारत के बड़े
नेता थे ! इस तीनों नेताओ ने अंग्रेज़ो के बंगाल विभाजन
का विरोध शुरू किया ! इस आंदोलन का एक
हिस्सा था (अंग्रेज़ो भारत छोड़ो) (अँग्रेजी सरकार
का असहयोग) करो ! (अँग्रेजी कपड़े मत पहनो)
(अँग्रेजी वस्तुओ का बहिष्कार करो) ! और
दूसरा हिस्सा था पोजटिव ! कि भारत मे
स्वदेशी का निर्माण करो ! स्वदेशी पथ पर आगे बढ़ो !
लोकमान्य तिलक ने अपने शब्दो मे इसको स्वदेशी आंदोलन
कहा ! अँग्रेजी सरकार इसको भंग भंग विरोधे आंदोलन
कहती रही !लोकमान्य तिलक कहते थे यह
हमारा स्वदेशी आंदोलन है ! और उस आंदोलन के ताकत
इतनी बड़ी थी !कि यह तीनों नेता अंग्रेज़ो के खिलाफ
जो बोल देते उसे पूरे भारत के लोग अपना लेते ! जैसे उन्होने
आरके इलान किया अँग्रेजी कपड़े पहनना बंद करो !
करोड़ो भारत वासियो ने अँग्रेजी कपड़े पहनना बंद कर
दिया ! उयर उसी समय भले हिंदुतसनी कपड़ा मिले
मोटा मिले पतला मिले वही पहनना है ! फिर उन्होने
कहाँ अँग्रेजी बलेड का इस्तेमाल करना बंद करो ! तो भारत के
हजारो नाईयो ने अँग्रेजी बलेड से दाड़ी बनाना बंद कर
दिया ! और इस तरह उस्तरा भारत मे वापिस आया ! फिर
लोक मान्य तिलक ने कहा अँग्रेजी चीनी खाना बंद करो !
क्यू कि चीनी उस वक्त इंग्लैंड से बन कर आती थी
भारत मे गुड बनाता था ! तो हजारो लाखो हलवाइयों ने गुड
दाल कर मिठाई बनाना शुरू कर दिया ! फिर उन्होने अपील
लिया अँग्रेजी कपड़े और अँग्रेजी साबुन से अपने घरो को मुकत
करो ! तो हजारो लाखो धोबियो ने अँग्रेजी साबुन से कपड़े
धोना मुकत कर दिया !और काली मिट्टी से कपड़े धोने लगे !
फिर उन्होने ने पंडितो से कहा तुम शादी करवाओ अगर !
तो उन लोगो कि मत करवाओ जो अँग्रेजी वस्त्र पहनते हो !
तो पंडितो ने सूट पैंट पहने टाई पहनने वालों का बहिष्कार कर
दिया !
इतने व्यापक स्तर पर ये आंदोलन फैला !कि 5-6 साल मे
अँग्रेजी सरकार घबरागी क्यूंकि उनका माल बिकना बंद
हो गया ! ईस्ट इंडिया कंपनी का धंधा चोपट हो गया !
तो ईस्ट इंडिया कंपनी ने अंग्रेज़ सरकार पर दबाव डाला !
कि हमारा तो धंधा ही चोपट हो गया भारत मे !
भारतीयो ने हमार समान खरीदना बंद कर दिया है ! हमारे
सामानो की होली जालाई जा रही हैं ! लोकमान्य तिलक
के 1 करोड़ 20 लाख कार्यकर्ता ये काम कर रहे हैं !हमारे पास
कोई उपाय नहीं है आप इन भारतवासियो के मांग को मंजूर
करो मांग क्या थी कि यह जो बंटवारा किया है बंगाल
का हिन्दू मुस्लिम से आधार पर इसको वापिस लो हमे बंगाल
के विभाजन संप्रदाय के आधार पर नहीं चाहिए !!
! और आप जानते अँग्रेजी सरकार को झुकना पड़ा ! और 1911
मे divison of bangal
act वापिस लिया गया ! और इस तरह पूरे देश मे लोकमान्य
तिलक की जय जयकार होने लगी !!
तो मित्रो इतनी बड़ी होती है बहिष्कार कि ताकत !
जिसने अंग्रेज़ो को झुका दिया और मजबूर कर
दिया कि वो बंगाल विभाजन वापस लें ! हमेशा याद रखें
कि दुश्मन को अगर खत्म करना है तो उसकी supply line
ही काट दो ! दुश्मन अपने आप खत्म हो जाएगा ! स्वदेशी और
स्वराज्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं ! बिना स्वदेशी के
स्वराज्य कभी संभव नहीं !!
भारतीयो मे स्वदेशी की अलख जगाने वाले !
स्वदेशी आंदोलन के जनक लोकमान्य तिलक को शत शत नमन
स्वदेशी से समृद्धि
विनायक म्हणा नो फोटो मस्त छे
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

नमस्कार मित्रो

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आज के शाखा कार्य में आपको एक बहुत ही रोमांचक एवं भावना ओ से भरी हुई कहानी पेश करना चाहता हु ये  कहानी मेरी पसंदीदा कहानी ओ में से हे .
 ये कहानी मानवीय मूल्यों और रिस्तो से जुडी हुई हे .जो लोग रुपये -धन को रिस्तो और कर्म से महान गिनते हे उनकी दशा क्या होती हे और मानवता और सहजता से जीने से क्या प्राप्त होता हे वो इस कहानी के माध्यम से पता चलता हे .
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बात बहुत पुरानी है। आठ-दस साल पहले की।

मैं अपने एक मित्र का पासपोर्ट बनवाने के लिए दिल्ली के पासपोर्ट ऑफिस गया था।

उन दिनों इंटरनेट पर फार्म भरने की सुविधा नहीं थी। पासपोर्ट दफ्तर में दलालों का बोलबाला था और खुलेआम दलाल पैसे लेकर पासपोर्ट के फार्म बेचने से लेकर उसे भरवाने, जमा करवाने और पासपोर्ट बनवाने का काम करते थे।

मेरे मित्र को किसी कारण से पासपोर्ट की जल्दी थी, लेकिन दलालों के दलदल में फंसना नहीं चाहते थे।

हम पासपोर्ट दफ्तर पहुंच गए, लाइन में लग कर हमने पासपोर्ट का तत्काल फार्म भी ले लिया। पूरा फार्म भर लिया। इस चक्कर में कई घंटे निकल चुके थे, और अब हमें िकसी तरह पासपोर्ट की फीस जमा करानी थी।

हम लाइन में खड़े हुए लेकिन जैसे ही हमारा नंबर आया बाबू ने खिड़की बंद कर दी और कहा कि समय खत्म हो चुका है अब कल आइएगा।

मैंने उससे मिन्नतें की, उससे कहा कि आज पूरा दिन हमने खर्च किया है और बस अब केवल फीस जमा कराने की बात रह गई है, कृपया फीस ले लीजिए।

बाबू बिगड़ गया। कहने लगा, "आपने पूरा दिन खर्च कर दिया तो उसके लिए वो जिम्मेदार है क्या? अरे सरकार ज्यादा लोगों को बहाल करे। मैं तो सुबह से अपना काम ही कर रहा हूं।"

मैने बहुत अनुरोध किया पर वो नहीं माना। उसने कहा कि बस दो बजे तक का समय होता है, दो बज गए। अब कुछ नहीं हो सकता।

मैं समझ रहा था कि सुबह से दलालों का काम वो कर रहा था, लेकिन जैसे ही बिना दलाल वाला काम आया उसने बहाने शुरू कर दिए हैं। पर हम भी अड़े हुए थे कि बिना अपने पद का इस्तेमाल किए और बिना उपर से पैसे खिलाए इस काम को अंजाम देना है।
मैं ये भी समझ गया था कि अब कल अगर आए तो कल का भी पूरा दिन निकल ही जाएगा, क्योंकि दलाल हर खिड़की को घेर कर खड़े रहते हैं, और आम आदमी वहां तक पहुंचने में बिलबिला उठता है।

खैर, मेरा मित्र बहुत मायूस हुआ और उसने कहा कि चलो अब कल आएंगे।
मैंने उसे रोका। कहा कि रुको एक और कोशिश करता हूं।

बाबू अपना थैला लेकर उठ चुका था। मैंने कुछ कहा नहीं, चुपचाप उसके-पीछे हो लिया। वो उसी दफ्तर में तीसरी या चौथी मंजिल पर बनी एक कैंटीन में गया, वहां उसने अपने थैले से लंच बॉक्स निकाला और धीरे-धीरे अकेला खाने लगा।

मैं उसके सामने की बेंच पर जाकर बैठ गया। उसने मेरी ओर देखा और बुरा सा मुंह बनाया। मैं उसकी ओर देख कर मुस्कुराया। उससे मैंने पूछा कि रोज घर से खाना लाते हो?
उसने अनमने से कहा कि हां, रोज घर से लाता हूं।

मैंने कहा कि तुम्हारे पास तो बहुत काम है, रोज बहुत से नए-नए लोगों से मिलते होगे?
वो पता नहीं क्या समझा और कहने लगा कि हां मैं तो एक से एक बड़े अधिकारियों से मिलता हूं।

कई आईएएस, आईपीएस, विधायक और न जाने कौन-कौन रोज यहां आते हैं। मेरी कुर्सी के सामने बड़े-बड़े लोग इंतजार करते हैं।

मैंने बहुत गौर से देखा, ऐसा कहते हुए उसके चेहरे पर अहं का भाव था।
मैं चुपचाप उसे सुनता रहा।

फिर मैंने उससे पूछा कि एक रोटी तुम्हारी प्लेट से मैं भी खा लूं? वो समझ नहीं पाया कि मैं क्या कह रहा हूं। उसने बस हां में सिर हिला दिया।
मैंने एक रोटी उसकी प्लेट से उठा ली, और सब्जी के साथ खाने लगा।

वो चुपचाप मुझे देखता रहा। मैंने उसके खाने की तारीफ की, और कहा कि तुम्हारी पत्नी बहुत ही स्वादिष्ट खाना पकाती है।
वो चुप रहा।

मैंने फिर उसे कुरेदा। तुम बहुत महत्वपूर्ण सीट पर बैठे हो। बड़े-बड़े लोग तुम्हारे पास आते हैं। तो क्या तुम अपनी कुर्सी की इज्जत करते हो?

अब वो चौंका। उसने मेरी ओर देख कर पूछा कि इज्जत? मतलब?

मैंने कहा कि तुम बहुत भाग्यशाली हो, तुम्हें इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली है, तुम न जाने कितने बड़े-बड़े अफसरों से डील करते हो, लेकिन तुम अपने पद की इज्जत नहीं करते।

उसने मुझसे पूछा कि ऐसा कैसे कहा आपने? मैंने कहा कि जो काम दिया गया है उसकी इज्जत करते तो तुम इस तरह रुखे व्यवहार वाले नहीं होते।

देखो तुम्हारा कोई दोस्त भी नहीं है। तुम दफ्तर की कैंटीन में अकेले खाना खाते हो, अपनी कुर्सी पर भी मायूस होकर बैठे रहते हो, लोगों का होता हुआ काम पूरा करने की जगह अटकाने की कोशिश करते हो।

मान लो कोई एकदम दो बजे ही तुम्हारे काउंटर पर पहुंचा तो तुमने इस बात का लिहाज तक नहीं किया कि वो सुबह से लाइऩ में खड़ा रहा होगा,

और तुमने फटाक से खिड़की बंद कर दी। जब मैंने तुमसे अनुरोध किया तो तुमने कहा कि सरकार से कहो कि ज्यादा लोगों को बहाल करे।

मान लो मैं सरकार से कह कर और लोग बहाल करा लूं, तो तुम्हारी अहमियत घट नहीं जाएगी? हो सकता है तुमसे ये काम ही ले लिया जाए। फिर तुम कैसे आईएएस, आईपीए और विधायकों से मिलोगे?

भगवान ने तुम्हें मौका दिया है रिश्ते बनाने के लिए। लेकिन अपना दुर्भाग्य देखो, तुम इसका लाभ उठाने की जगह रिश्ते बिगाड़ रहे हो।

मेरा क्या है, कल भी आ जाउंगा, परसों भी आ जाउंगा। ऐसा तो है नहीं कि आज नहीं काम हुआ तो कभी नहीं होगा। तुम नहीं करोगे कोई और बाबू कल करेगा।

पर तुम्हारे पास तो मौका था किसी को अपना अहसानमंद बनाने का। तुम उससे चूक गए।
वो खाना छोड़ कर मेरी बातें सुनने लगा था।
मैंने कहा कि पैसे तो बहुत कमा लोगे, लेकिन रिश्ते नहीं कमाए तो सब बेकार है। क्या करोगे पैसों का? अपना व्यवहार ठीक नहीं रखोगे तो तुम्हारे घर वाले भी तुमसे दुखी रहेंगे। यार दोस्त तो नहीं हैं,

ये तो मैं देख ही चुका हूं। मुझे देखो, अपने दफ्तर में कभी अकेला खाना नहीं खाता।

यहां भी भूख लगी तो तुम्हारे साथ खाना खाने आ गया। अरे अकेला खाना भी कोई ज़िंदगी है?

मेरी बात सुन कर वो रुंआसा हो गया। उसने कहा कि आपने बात सही कही है साहब। मैं अकेला हूं। पत्नी झगड़ा कर मायके चली गई है। बच्चे भी मुझे पसंद नहीं करते। मां है, वो भी कुछ ज्यादा बात नहीं करती। सुबह चार-पांच रोटी बना कर दे देती है, और मैं तनहा खाना खाता हूं। रात में घर जाने का भी मन नहीं करता। समझ में नहींं आता कि गड़बड़ी कहां है?

मैंने हौले से कहा कि खुद को लोगों से जोड़ो। किसी की मदद कर सकते तो तो करो। देखो मैं यहां अपने दोस्त के पासपोर्ट के लिए आया हूं। मेरे पास तो पासपोर्ट है।

मैंने दोस्त की खातिर तुम्हारी मिन्नतें कीं। निस्वार्थ भाव से। इसलिए मेरे पास दोस्त हैं, तुम्हारे पास नहीं हैं।

वो उठा और उसने मुझसे कहा कि आप मेरी खिड़की पर पहुंचो। मैं आज ही फार्म जमा करुंगा।

मैं नीचे गया, उसने फार्म जमा कर लिया, फीस ले ली। और हफ्ते भर में पासपोर्ट बन गया।

बाबू ने मुझसे मेरा नंबर मांगा, मैंने अपना मोबाइल नंबर उसे दे दिया और चला आया।

कल दिवाली पर मेरे पास बहुत से फोन आए। मैंने करीब-करीब सारे नंबर उठाए। सबको हैप्पी दिवाली बोला।

उसी में एक नंबर से फोन आया, "रविंद्र कुमार चौधरी बोल रहा हूं साहब।"

मैं एकदम नहीं पहचान सका। उसने कहा कि कई साल पहले आप हमारे पास अपने किसी दोस्त के पासपोर्ट के लिए आए थे, और आपने मेरे साथ रोटी भी खाई थी।

आपने कहा था कि पैसे की जगह रिश्ते बनाओ।

मुझे एकदम याद आ गया। मैंने कहा हां जी चौधरी साहब कैसे हैं?

उसने खुश होकर कहा, "साहब आप उस दिन चले गए, फिर मैं बहुत सोचता रहा। मुझे लगा कि पैसे तो सचमुच बहुत लोग दे जाते हैं, लेकिन साथ खाना खाने वाला कोई नहीं मिलता। सब अपने में व्यस्त हैं। मैं

साहब अगले ही दिन पत्नी के मायके गया, बहुत मिन्नतें कर उसे घर लाया। वो मान ही नहीं रही थी।

वो खाना खाने बैठी तो मैंने उसकी प्लेट से एक रोटी उठा ली,

कहा कि साथ खिलाओगी? वो हैरान थी।

रोने लगी। मेरे साथ चली आई। बच्चे भी साथ चले आए।

साहब अब मैं पैसे नहीं कमाता। रिश्ते कमाता हूं। जो आता है उसका काम कर देता हूं।

साहब आज आपको हैप्पी दिवाली बोलने के लिए फोन किया है।

अगल महीने बिटिया की शादी है। आपको आना है।

अपना पता भेज दीजिएगा। मैं और मेरी पत्नी आपके पास आएंगे।

मेरी पत्नी ने मुझसे पूछा था कि ये पासपोर्ट दफ्तर में रिश्ते कमाना कहां से सीखे?

तो मैंने पूरी कहानी बताई थी। आप किसी से नहीं मिले लेकिन मेरे घर में आपने रिश्ता जोड़ लिया है।

सब आपको जानते हैं। बहुत दिनों से फोन करने की सोचता था, लेकिन हिम्मत नहीं होती थी।

आज दिवाली का मौका निकाल कर कर रहा हूं। शादी में आपको आना है। बिटिया को आशीर्वाद देने। रिश्ता जोड़ा है आपने। मुझे यकीन है आप आएंगे।

वो बोलता जा रहा था, मैं सुनता जा रहा था। सोचा नहीं था कि सचमुच उसकी ज़िंदगी में भी पैसों पर रिश्ता भारी पड़ेगा।

लेकिन मेरा कहा सच साबित हुआ। आदमी भावनाओं से संचालित होता है। कारणों से नहीं। कारण से तो मशीनें चला करती हैं।
हमारी कहानी👆

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