04 April - दया
हे प्रभु ! अति दुष्ट एवं मलिनता से ढके हुए मनुष्य में भी आपका दिव्य प्रकाश छिपा हुआ है जो सत-संगति और आत्मसुधार की तीव्र इच्छाओं जैसी उचित परिस्थितियों में फूट पड़ने के लिए प्रतीक्षा कर रहा है |
हे प्रभु ! हम आपके कृतज्ञ हैं कि कोई पाप अक्षम्य नहीं; कोई बुराई दुरलंघ्य नहीं; क्योंकि सापेक्षता के इस जगत में कुछ भी परिपूर्ण नहीं है |
हे परमपिता ! मेरा मार्गदर्शन करें कि मैं आपकी सम्भ्रान्त संतानों को उनकी अन्तर्निहित पवित्रता, अमरता, एवं दिव्य पुत्रत्व की चेतन के प्रति जाग्रत कर सकूँ |
- श्री श्री परमहंस योगानंद
"Whispers from Eternity"
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