Saturday, May 6, 2017

मैंने सुना है एक बार बनारस में एक महात्मा की मृत्यु हुई और उसी दिन एक वेश्या की भी मृत्यु हुई। दोनों आमने-सामने रहते थे। अकसर महात्मा और वेश्या आमने-सामने रहते हैं। दोनों का बड़ा पुराना लेन-देन है। महात्मा के बिना वेश्या नहीं हो सकती और वेश्या के बिना महात्मा नहीं हो सकता। जिस दिन दुनिया में महात्मा नहीं होंगे, वेश्याएं समाप्त हो जाएंगी। क्योंकि वेश्याओं को पैदा कैसे करोगे? महात्मा सिखाता है काम-वासना को दबाओ। और जब महात्मा का पाठ सीख लिया तो फिर वेश्या पैदा होती है। वह दबी हुई काम-वासना वेश्या को पैदा करती है। अगर वेश्याएं मिटानी हैं तो पहले महात्मा मिटाने होंगे। सो कहानी ठीक ही मालूम पड़ती है, तर्कयुक्त मालूम पड़ती है। महात्मा और वेश्या आमने-सामने रहते थे। दोनों साथ-साथ मर गए। देवदूत लेने आए। महात्मा तो बहुत नाराज हुआ, क्योंकि उसको नरक की तरफ ले चले--पाताल की तरफ, जहां आजकल अमरीका है। और वेश्या को स्वर्ग की तरफ ले चले, आकाश की तरफ। महात्मा ने कहा रुको, यह ज्यादती हो रही है। मैं महात्मा हूं। लगता है कुछ भूल-चूक हो गई। दफ्तर की कोई भूल मालूम होती है। स्वर्ग मुझे ले जाना चाहिए। देवदूत हंसने लगे। उन्होंने कहा, शक हमें भी हुआ था। तो हमने परमात्मा से पूछा, कुछ भूल-चूक तो नहीं हो गई? कि महात्मा को नरक ले जाना है, वेश्या को स्वर्ग? हमें भी शंका उठी थी तो हम पूछ कर ही आए हैं। अच्छा हुआ हम पूछ कर ही आए। परमात्मा ने कहा, कोई भूल-चूक नहीं हुई, यही शाश्वत नियम है। शाश्वत नियम? हम नए-नए देवदूत हैं, सिक्खड़ हैं, सच पूछो तो यह हमारा पहला ही काम है। तो हमें तो कुछ पता नहीं शाश्वत नियमों का। तो हम और भी चौंके। हमने पूछा, आपका मतलब क्या? तो उन्होंने कहा, बात यह है कि महात्मा जिंदगी भर यह सोचता रहा कि मजा वेश्या के घर हो रहा है। और वेश्या जीवन भर सोचती रही, रोती रही कि मजा है, आनंद है, तो महात्मा के झोंपड़े में है। महात्मा करता था पूजा, बजाता था घंटी मेरे सामने, सताता था मुझको घंटी बजा बजा कर। अब किसी के भी सामने घंटी बजाओगे तो तुम समझ सकते हो। और रोज-रोज! और पानी चढ़ा रहे हो चाहे ठंड हो, चाहे गर्मी हो। तो घंटी तो मेरे सामने बजाता था लेकिन इसका दिल लगा रहता था वहां--वेश्या की तरफ। खिड़की में खड़े होकर ऐसे तो राम-राम-राम-राम, राम-राम करता था, माला जपता था, मगर देखता रहता था खिड़की से वेश्या को। रात को उठ-उठ कर आता था। उठता था राम-राम कहते हुए, बुलाता था मुझे और मुझको भी जगा देता था। मगर वेश्या के घर नाच चल रहा है, गीत चल रहा है, वीणा बज रही है, मस्त होकर लोग वाह-वाह कर रहे हैं। दिल में इसके बड़ी खटक होती थी। कि मैं भी कहां उलझ गया हूं! यह कौन-सी महात्मागीरी में फंस गया! मजा वहां है, इधर तो उदासी ही उदासी है। और वेश्या को जब भी समय मिलता था तब वह रोती थी। जब महात्मा मंदिर में घंटी बजाता था और पूजा उठती, धूप जलती और सुगंध वेश्या तक पहुंचती तो वह रोती थी कि एक मैं अभागिन! यूं ही जिंदगी बीत जाएगी? परमात्मा को कब पुकारूंगी? उसने कभी पुकारा नहीं मगर उसके आंसू मुझ तक पहुंच गए। और यह मुझे रोज पुकारता रहा लेकिन इसकी पुकार में पुकार थी ही नहीं क्योंकि प्राणों का आह्वान नहीं था। इसे नरक ले जाओ, वेश्या को स्वर्ग ले आओ। ऐसा कुछ आदमी का चित्त है। जो जहां नहीं है वहां होना चाहता है। तुम कहते हो सुख-सुविधा में हो, मगर तुम हो नहीं वहां सुख-सुविधा में। तुम सोचते हो यही होओगे कि फकीर मजे में हैं, संन्यासी मजे में हैं, महात्मा मजे में हैं। इसलिए तुम भीतरर् ईष्या से जल रहे हो। औरर् ईष्या उदासी लाएगी । 💕💕 प्रेम - रंग - रस ओढ़ चुनरिया ( दुल्हन # 10) 🎵🎵🎵 ओशो💕💕

मैंने सुना है एक बार बनारस में एक महात्मा की मृत्यु हुई और उसी दिन एक वेश्या की भी मृत्यु हुई। दोनों आमने-सामने रहते थे। अकसर महात्मा और वेश्या आमने-सामने रहते हैं। दोनों का बड़ा पुराना लेन-देन है। महात्मा के बिना वेश्या नहीं हो सकती और वेश्या के बिना महात्मा नहीं हो सकता। जिस दिन दुनिया में महात्मा नहीं होंगे, वेश्याएं समाप्त हो जाएंगी। क्योंकि वेश्याओं को पैदा कैसे करोगे? महात्मा सिखाता है काम-वासना को दबाओ। और जब महात्मा का पाठ सीख लिया तो फिर वेश्या पैदा होती है। वह दबी हुई काम-वासना वेश्या को पैदा करती है। अगर वेश्याएं मिटानी हैं तो पहले महात्मा मिटाने होंगे।
सो कहानी ठीक ही मालूम पड़ती है, तर्कयुक्त मालूम पड़ती है। महात्मा और वेश्या आमने-सामने रहते थे। दोनों साथ-साथ मर गए। देवदूत लेने आए। महात्मा तो बहुत नाराज हुआ, क्योंकि उसको नरक की तरफ ले चले--पाताल की तरफ, जहां आजकल अमरीका है। और वेश्या को स्वर्ग की तरफ ले चले, आकाश की तरफ। महात्मा ने कहा रुको, यह ज्यादती हो रही है। मैं महात्मा हूं। लगता है कुछ भूल-चूक हो गई। दफ्तर की कोई भूल मालूम होती है। स्वर्ग मुझे ले जाना चाहिए।
देवदूत हंसने लगे। उन्होंने कहा, शक हमें भी हुआ था। तो हमने परमात्मा से पूछा, कुछ भूल-चूक तो नहीं हो गई? कि महात्मा को नरक ले जाना है, वेश्या को स्वर्ग? हमें भी शंका उठी थी तो हम पूछ कर ही आए हैं। अच्छा हुआ हम पूछ कर ही आए। परमात्मा ने कहा, कोई भूल-चूक नहीं हुई, यही शाश्वत नियम है। शाश्वत नियम? हम नए-नए देवदूत हैं, सिक्खड़ हैं, सच पूछो तो यह हमारा पहला ही काम है। तो हमें तो कुछ पता नहीं शाश्वत नियमों का। तो हम और भी चौंके। हमने पूछा, आपका मतलब क्या?
तो उन्होंने कहा, बात यह है कि महात्मा जिंदगी भर यह सोचता रहा कि मजा वेश्या के घर हो रहा है। और वेश्या जीवन भर सोचती रही, रोती रही कि मजा है, आनंद है, तो महात्मा के झोंपड़े में है। महात्मा करता था पूजा, बजाता था घंटी मेरे सामने, सताता था मुझको घंटी बजा बजा कर। अब किसी के भी सामने घंटी बजाओगे तो तुम समझ सकते हो। और रोज-रोज! और पानी चढ़ा रहे हो चाहे ठंड हो, चाहे गर्मी हो। तो घंटी तो मेरे सामने बजाता था लेकिन इसका दिल लगा रहता था वहां--वेश्या की तरफ। खिड़की में खड़े होकर ऐसे तो राम-राम-राम-राम, राम-राम करता था, माला जपता था, मगर देखता रहता था खिड़की से वेश्या को। रात को उठ-उठ कर आता था। उठता था राम-राम कहते हुए, बुलाता था मुझे और मुझको भी जगा देता था। मगर वेश्या के घर नाच चल रहा है, गीत चल रहा है, वीणा बज रही है, मस्त होकर लोग वाह-वाह कर रहे हैं। दिल में इसके बड़ी खटक होती थी। कि मैं भी कहां उलझ गया हूं! यह कौन-सी महात्मागीरी में फंस गया! मजा वहां है, इधर तो उदासी ही उदासी है।
और वेश्या को जब भी समय मिलता था तब वह रोती थी। जब महात्मा मंदिर में घंटी बजाता था और पूजा उठती, धूप जलती और सुगंध वेश्या तक पहुंचती तो वह रोती थी कि एक मैं अभागिन! यूं ही जिंदगी बीत जाएगी? परमात्मा को कब पुकारूंगी? उसने कभी पुकारा नहीं मगर उसके आंसू मुझ तक पहुंच गए। और यह मुझे रोज पुकारता रहा लेकिन इसकी पुकार में पुकार थी ही नहीं क्योंकि प्राणों का आह्वान नहीं था। इसे नरक ले जाओ, वेश्या को स्वर्ग ले आओ।
ऐसा कुछ आदमी का चित्त है। जो जहां नहीं है वहां होना चाहता है। तुम कहते हो सुख-सुविधा में हो, मगर तुम हो नहीं वहां सुख-सुविधा में। तुम सोचते हो यही होओगे कि फकीर मजे में हैं, संन्यासी मजे में हैं, महात्मा मजे में हैं। इसलिए तुम भीतरर् ईष्या से जल रहे हो। औरर् ईष्या उदासी लाएगी ।
💕💕 प्रेम - रंग - रस ओढ़ चुनरिया ( दुल्हन  # 10)
🎵🎵🎵 ओशो💕💕

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