卐 गुड़ी पड़वां 卐
रंग - बिरंगी सृष्टि के सृजन का पर्व
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रचाव की यात्रा रंगों के रास्ते पर ही आगे बढ़ती है, इसलिए पहले होली आती है और रंग पंचमी रंगों के रास्ते बना देती है और फीर गुड़ी पड़वां इस रास्ते पर अपने पांव रखकर रचाव की यात्रा आरंभ कर देता है ।
ब्रह्मपुराण में उल्लेख है कि गुड़ी पड़वा के दिन ही ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना आरंभ कर दी थी ।
यह न सिर्फ नव संवत्सर का आरंभ है, वरन् ऋतुओं के पूरे चक्र का लेखा जोखा भी है ।
अतः गुड़ी पड़वा - वर्ष प्रतिपदा उत्सवों का उत्सव है ।
चैत्र प्रतिपदा चैत्र के शुक्ल पक्ष की पहली तिथि है, अर्थात यह उजास के आरंभ होने का दिन है ।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह इसलिए शुभ संकेत का प्रतीक है क्योंकि इस दिन सूर्य अपनी सर्वोत्तम दशा में रहता है ।
भास्कराचार्य ने इसी दिन से सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, मास, और वर्ष की गणना करते हुए पंचांग बनाया था ।
इस पर्व से जुड़ी अनेक रीतियां हैं --
# इस दिन विशेष रूप से
# श्रीखंड और पोरणपोळी बनाई जाती है ।
# इस दिन भोर में नदी से जल लाकर कलश की पूजा अर्चना की जाती है
# नीम की कोपलें शक्कर के साथ खाई जाती है
# मराठी वर्ग इस दिन घर के दरवाजे पर प्रातः काल गुड़ी बांधते हैं ।स्त्री गुड़ी को थामे रहती है और पुरुष बांधते हैं ।
# वर्ष प्रतिपदा विक्रम संवत् के आरंभ होने का दिन है । ईसा से 58 वर्ष पूर्व विक्रम संवत् का आरंभ चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने इसी दिन किया था
# ऋण धन के ही नहीं होते, वे जड़ बंधनों के, अंधकार के, और असहिष्णुता के भी होते हैं ।विक्रमादित्य ने इन्हीं ऋणों से स्वयं को व पूरे राष्ट्र को इसी दिन मुक्त किया था इसलिए विक्रमादित्य इस राष्ट्र के सबसे उजले इतिहास पुरुष हैं
इन रीतियों का अभिप्राय है कि
# प्रकाश का स्वागत
# संघर्ष की कड़वाहट की भी मीठे भाव के साथ अगवानी व उसे आत्मसात करने कामना संकल्प
# स्त्री - पुरुष का अटूट साथ
हमारे तन, और मन दोनों की जड़ बंधनों से मुक्ति
इस प्रकार गुड़ी पड़वा पर्व पूरी उदारता के साथ हमारे जीवन को ज्योतिर्मय कर देता है ।
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