जख्मों के साये
जख्मों गमों को सहला रहा हूँ ........
लोगों को लगा में जी रहा हूँ ......
मेरे खयालो -ख्वाबों में
मयस्सर नहीं मुस्कुराना .........
फ़िर भी इक उम्मीद से जी रहा हूँ
लोगो को लग रहा .......!
में जी रहा हूँ ................
अपने उन जख्मों की टीस ओर दर्द को .........
अश्को से भिगो रहा हूँ ............
लोगों को लग रहा मॆं जी रहा हूँ ......
फिर भी इक उम्मीद आस ! .......
तुम्हारी इक मुस्कान ..........
जीने का सबब बनेगी ........!
इस बात का इल्म है मुझे ......
तुम्हारी इक मुस्कान इक नये ज़ख्म का "सबब " बनेगी ........
फ़िर भी जी रहा हूँ ............!
अश्को के सैलाब से जख़्मों को भिगोकर ..........
दर्द और टीस को पी रहा हूँ ..........
लोगों को लग रहा है में जी रहा हूँ ....
जख़्मों गमों को सहला रहा हूँ ......
जाने क्यों लोगों को लग रहा
मे जी रहा हूँ .........
बस ! जी रहा हूँ बस !जी रहा हूँ
स्वरचित रचना बी .डी .गुहा रायपुर
छत्तीसगढ़
No comments:
Post a Comment